थप्पड़: मज़ाक, भाईचारा या असंवेदनशीलता?

27 अप्रैल 2025 को दिल्ली कैपिटल्स और कोलकाता नाइट राइडर्स के मैच से पहले एक वीडियो सामने आया। इस वीडियो में कुलदीप यादव — दिल्ली कैपिटल्स के खिलाड़ी — रिंकू सिंह — केकेआर के विस्फोटक बल्लेबाज़ — के साथ खड़े होते हैं। दोनों हंस रहे होते हैं, माहौल हल्का-फुल्का है, फिर अचानक कुलदीप एक थप्पड़ रिंकू के गाल पर मारते हैं। कैमरा अभी भी रोल कर रहा है। रिंकू पहले तो थोड़ा हकबका जाते हैं, उनकी मुस्कान एक सेकंड में गायब हो जाती है। और फिर, कुलदीप एक दूसरा थप्पड़ मारते हैं। रिंकू का चेहरा अब पूरी तरह गंभीर हो चुका है।

और यहीं से सोशल मीडिया पर भूचाल आता है।


सोशल मीडिया का दोहरा रिएक्शन

वीडियो वायरल होता है, और लोगों के दो खेमे बन जाते हैं:

पहला खेमा:

“ये तो पुराने दोस्त हैं यार! मज़ाक कर रहे हैं। हमारे यहां भी दोस्ती में थप्पड़ चलते हैं। इतना तो चलता है!”

दूसरा खेमा:

“कैमरे के सामने ये थप्पड़ मज़ाक नहीं, बेइज्जती है। रिंकू का चेहरा देखो, वो सकपका गए थे। यह दोस्ती नहीं, लापरवाही है।”

सच बात यह है कि दोनों ही खेमों की भावनाएं सही हैं, पर सच्चाई शायद इन दोनों के बीच में कहीं है।


दोस्ती की सीमाएं: जब कैमरा ऑन होता है

कुलदीप यादव और रिंकू सिंह दोनों उत्तर प्रदेश से हैं। रणजी में एक-दूसरे के खिलाफ भी खेले हैं और साथ भी खेले हैं। केकेआर में रिंकू लंबे समय से हैं और कुलदीप भी पहले वहीं थे। दोनों टीम इंडिया के लिए भी समय बिताते रहे हैं। यानी रिश्ता पुराना है, घनिष्ठ है। लेकिन…

“जब कैमरा ऑन हो और आप किसी को थप्पड़ मारें, तो वह केवल निजी मज़ाक नहीं रहता — वह सार्वजनिक कृत्य बन जाता है।”

रिंकू भले दोस्त हों, लेकिन उस पल में जब वह हंस रहे थे और फिर उनके चेहरे की भंगिमा पलट गई, वह कैमरे ने कैद कर लिया। पब्लिक ने देखा, सोशल मीडिया ने रिप्ले किया, और सबकी अपनी व्याख्या सामने आने लगी।


क्या ये “हरभजन-श्रीसंत” 2.0 था?

2008 का वो कुख्यात वाकया कौन भूल सकता है जब हरभजन सिंह ने गुस्से में आकर श्रीसंत को थप्पड़ मार दिया था? श्रीसंत कैमरे पर रोते दिखाई दिए थे और हरभजन को पूरे सीज़न से बैन कर दिया गया था।

यहां मामला थोड़ा अलग है — न कोई आक्रोश, न आंसू। लेकिन सवाल वही है:

“क्या एक खिलाड़ी को कैमरे के सामने दूसरे खिलाड़ी को थप्पड़ मारने का अधिकार है — चाहे वह मज़ाक में ही क्यों न हो?”


रिंकू के चेहरे की कहानी

जो लोग कह रहे हैं कि “मज़ाक था”, उन्हें एक बार फिर रिंकू सिंह के चेहरे के एक्सप्रेशन्स को ध्यान से देखना चाहिए। एक खिलाड़ी, जो हमेशा मैदान पर हंसता मुस्कराता दिखता है, अचानक शांत, असहज और थोड़े शॉक्ड दिखता है। यह तब होता है जब मज़ाक मर्यादा की सीमाएं छूने लगता है।

पहले थप्पड़ के बाद रिंकू हकबकाए। दूसरे के बाद, उन्होंने हल्का-सा प्रतिवाद किया — शायद कुछ कहा भी — लेकिन वो झेंप, वो संकोच, वो “क्या ये मज़ाक था?” वाला भाव, कई दर्शकों के लिए असहज कर देने वाला था।


KKR की क्लैरिफिकेशन वीडियो

जैसे ही वीडियो वायरल हुआ, कोलकाता नाइट राइडर्स ने एक नया वीडियो पोस्ट किया — जिसमें रिंकू और कुलदीप को गले मिलते, दिल का इशारा करते और हंसते हुए दिखाया गया। यह PR कंट्रोल था, ब्रांड मैनेजमेंट।

इस वीडियो के जरिए संदेश देने की कोशिश हुई कि “सब कुछ ठीक है। हम दोस्त हैं। यह सिर्फ मज़ाक था।”

लेकिन सच ये है कि अगर चीज़ें इतनी ठीक होती, तो शायद ये “क्लैरिफिकेशन वीडियो” की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।


क्या मज़ाक भी अनुशासन चाहता है?

क्रिकेट अब सिर्फ एक खेल नहीं, एक इंटरनेशनल स्पेक्टेकल है — हर मैच, हर मोमेंट लाखों लोगों के सामने लाइव होता है। खिलाड़ी केवल खिलाड़ी नहीं रहते — वे रोल मॉडल बन जाते हैं, ब्रांड बन जाते हैं। उनकी हर हरकत, हर प्रतिक्रिया scrutiny के लेंस से देखी जाती है।

मज़ाक में भी गरिमा ज़रूरी है — खासकर तब जब आप एक प्रोफेशनल सेटअप में हैं और कैमरे के सामने हैं।

यह सच है कि खिलाड़ी भी इंसान हैं, दोस्त होते हैं, लेकिन जब आप IPL जैसे ग्लोबल इवेंट में हो, तो आपकी हंसी भी स्क्रिप्टेड मानी जाती है और आपकी हरकतें मेसेज देती हैं।


क्या एक्शन लिया जाना चाहिए?

कई सोशल मीडिया यूज़र्स ने यह भी कहा कि कुलदीप यादव पर BCCI को एक्शन लेना चाहिए — कम से कम एक चेतावनी या आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी करना चाहिए। कुछ ने तो तुलना की हरभजन के मामले से और कहा कि “अगर हरभजन पर बैन लग सकता है, तो यहां भी बात उठनी चाहिए।”

लेकिन दूसरी तरफ यह भी है कि कोई आधिकारिक शिकायत नहीं आई। रिंकू सिंह ने न कोई बयान दिया, न नाराज़गी जताई। इसका मतलब यह भी हो सकता है कि वह वाकई में इसे मज़ाक समझ कर टाल गए। पर क्या यह रिंकू की विनम्रता थी, या असहजता?


कैमरा ऑन है, मतलब पूरा देश ऑन है

IPL सिर्फ एक खेल नहीं, एक राष्ट्रीय पर्व है। जब कैमरे ऑन होते हैं, तो सिर्फ खिलाड़ी नहीं, उनके रिश्ते, भावनाएं, और मज़ाक भी सबकी नज़रों में आ जाते हैं।

“पब्लिक डोमेन में कोई हरकत, चाहे कितनी भी निजी क्यों न हो, उसका असर सार्वजनिक पड़ता है।”

और यहीं से पूरा विवाद जन्म लेता है।


निष्कर्ष: मज़ाक की मर्यादा बनाम सार्वजनिक छवि

तो क्या कुलदीप यादव का यह थप्पड़ हंसी-मज़ाक था? शायद।

क्या रिंकू सिंह ने इसे दिल पर नहीं लिया? संभव है।

लेकिन क्या ये सही था? शायद नहीं।

क्योंकि…

  • ये कैमरे के सामने हुआ।
  • रिंकू की बॉडी लैंग्वेज सहज नहीं थी।
  • लाखों लोग देख रहे थे, जिनमें बच्चे भी शामिल हैं।
  • मज़ाक की भी एक सीमा होती है।

रिश्तों की गहराई और दोस्ती की मज़बूती हमें यह हक़ नहीं देती कि हम सार्वजनिक मंच पर एक दूसरे की मर्यादा लांघें — भले ही वह दो सेकंड के “थप्पड़” के रूप में क्यों न हो।


आख़िरी बात

रिंकू सिंह और कुलदीप यादव की दोस्ती पर हमें कोई शक नहीं। शायद इस थप्पड़ के पीछे सचमुच हंसी-मज़ाक ही था। लेकिन जब यह चीज़ लाखों दर्शकों के सामने जाती है, तो यह “मज़ाक” नहीं रह जाता — यह एक पब्लिक एक्ट बन जाता है जिसकी पब्लिक जवाबदेही बनती है।

तो अगली बार जब आप अपने दोस्त को मज़ाक में थप्पड़ मारें — ज़रा सोचिए, कैमरा ऑन है क्या?

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