ये कहानी एक 14 साल के लड़के की है।
एक ऐसे लड़के की, जो जब 13 साल का था तब ही IPL की बोली में बिक गया।
एक ऐसे लड़के की, जिसे सोशल मीडिया पर “युवा चमत्कार”, “बिहार का चमकता सितारा”, “सबसे कम उम्र का आईपीएल खिलाड़ी” कहा गया।
नाम – वैभव सूर्यवंशी।
टीम – राजस्थान रॉयल्स।
साल – 2025।
लेकिन अफ़सोस, ये कहानी किसी परीकथा की तरह नहीं, बल्कि एक सिस्टम की बेरुख़ी का आईना बन चुकी है।
ऑक्शन की चमक और धोखे की स्याही
जब IPL 2025 के लिए नीलामी हुई, तो अचानक एक नाम सबसे तेज़ी से ट्रेंड करने लगा – वैभव सूर्यवंशी।
13 साल की उम्र में 1.10 करोड़ में राजस्थान रॉयल्स ने खरीदा।
दुनिया हैरान। मीडिया दीवानी।
हैडलाइन चली – “बिहार के बेटे ने रचा इतिहास।”
सोचा गया – अब रिकॉर्ड टूटेंगे।
अब IPL का सबसे कम उम्र का खिलाड़ी इतिहास में दर्ज हो जाएगा।
पर हुआ क्या?
ना डेब्यू मिला, ना मैदान मिला, सिर्फ़ पानी की बोतल मिली।
अब तक का सफर – डगआउट में बैठा टैलेंट
सीज़न शुरू हुआ, मैच दर मैच बीते, राजस्थान जीतती रही, हारती रही…
पर हर प्लेइंग इलेवन में एक नाम गायब था – वैभव सूर्यवंशी।
- ना बतौर बल्लेबाज़ मौका मिला
- ना फील्डिंग करने उतरे
- ना इंपैक्ट प्लेयर बनाए गए
- बस हर मैच में ड्रिंक्स ब्रेक के दौरान मैदान में पानी ले जाते हुए दिखे
सोशल मीडिया पर तो ये तक कह दिया गया –
“चाइल्ड लेबर करवा रहे हो क्या?”
भाई, कोई मज़ाक है क्या?
13 साल की उम्र में खरीदो, सबके सामने “युवा भविष्य” कहो, और फिर एक मैच तक ना खिलाओ?
टीम में लिया, तो खेलने दो – वरना क्यों लिया?
राजस्थान रॉयल्स की टीम ने अगर इस खिलाड़ी को सिर्फ़ भविष्य के लिए खरीदा था, तो फिर कंसिस्टेंटली इलेवन में क्यों नहीं डालते?
कभी नेट्स में दिखाओ, कभी बेंच पर रखो, कभी मैच के दिन सिर्फ़ पानी पकड़ाओ… ये ट्रीटमेंट क्या दिखाता है?
ये सिर्फ़ मनोबल तोड़ने वाली बात नहीं है, ये एक टैलेंटेड खिलाड़ी के साथ अन्याय है।
क्या कहती है परफॉर्मेंस? क्या सिर्फ़ उम्र देखी जा रही है?
अब कोई बोलेगा कि “अरे अभी तो टी20 में 13 रन हैं, अभी बहुत छोटा है…”
तो भाई, फिर 1.10 करोड़ क्यों दिए थे?
थोड़ा देख लेते हैं वैभव का रिकॉर्ड:
- First-Class: 100 रन
- List A: 132 रन
- T20: 13 रन
मतलब लड़का सिर्फ़ विज्ञापन में बिकने वाला प्रोडक्ट नहीं है।
परफॉर्मेंस है, बैकग्राउंड है, स्किल है।
बिहार से आना कोई गुनाह तो नहीं?
हम सब जानते हैं – बिहार क्रिकेट का नाम बहुत कम लिया जाता है।
ना मज़बूत एसोसिएशन, ना इंटरनेशनल बैकिंग।
लेकिन जब कोई बच्चा अपने दम पर, अपने बल्ले के दम पर आईपीएल की नीलामी तक पहुंचता है, तो क्या उसे मंच नहीं मिलना चाहिए?
क्या बिहार से आना ही उसका क्राइम बन गया?
मानसिक असर – टूटती उम्मीदें, गिरता आत्मविश्वास
सोचो उस बच्चे के दिल पर क्या बीत रही होगी?
हर मैच में टीम के साथ बैठना, उम्मीद करना…
और फिर सिर्फ़ बोतल उठाना।
एक दो बार ठीक है।
लेकिन लगातार पूरे टूर्नामेंट तक?
ये एक खिलाड़ी के मनोबल को पूरी तरह से डिस्टर्ब कर सकता है।
उसके मन में ये सवाल आने लगता है –
“क्या मुझमें वाकई कुछ कमी है?”
और जब खिलाड़ी खुद पर शक करने लगता है –
वो सबसे खतरनाक मोड़ होता है।
राजस्थान रॉयल्स की सोच – भविष्य के नाम पर वर्तमान कुर्बान
राजस्थान रॉयल्स के लिए वैभव एक इन्वेस्टमेंट हो सकता है,
पर क्रिकेट में टैलेंट को तराशने के लिए मौका देना पड़ता है, सिर्फ़ उम्मीद नहीं।
बाकी टीमें युवाओं को लगातार मौका दे रही हैं।
चाहे वो तिलक वर्मा हों, अयुष बडोनी हों या राशिद खान (2017 में 18 की उम्र में डेब्यू)।
तो फिर वैभव क्यों बेंच पर?
अब क्या करना चाहिए?
- या तो साफ बोलो – अभी तैयार नहीं है
- या फिर मौके दो – छोटे-छोटे रोल्स से शुरुआत कराओ
- या उसे रिलीज़ करो ताकि वो कहीं और खुद को साबित कर सके
क्योंकि एक बात तो तय है –
बैठाकर बड़ा कोई नहीं बनता।
अंत में बस यही – वैभव को हौसला चाहिए, सिर्फ़ बोतल नहीं
वैभव सूर्यवंशी सिर्फ़ एक खिलाड़ी नहीं,
वो लाखों छोटे शहर के बच्चों की उम्मीद है।
वो एक मैसेज है – कि “अगर बिहार से कोई लड़का सपने देख सकता है, तो पूरे देश में किसी का भी हक है।”
पर जब ऐसा ट्रीटमेंट होता है,
तो वो मैसेज कुचला जाता है, और सिस्टम हँसता है।
तो जवाब दो राजस्थान रॉयल्स – टैलेंट लिया या ट्रॉफी का खिलौना?
IPL सिर्फ़ एंटरटेनमेंट नहीं,
ये भविष्य गढ़ने का मंच है।
अगर आपने वैभव को लिया है,
तो उसे सिर्फ़ पानी के लिए मत रखो।
उसे उसका सपना जीने दो।
